मन से जूझता अंतर्मन
ज़िन्दगी की बेचैन बंदिशें
कमबख्त जकड़ने को मचल रही
पुकारता है तुझको अंतर्मन
टूट रही जो सबल रही ।
आर्तनाद को उर में दबाकर रखो
धार दो विनाशकारी छिपाकर रखो
पहाड़ों का भी कभी धूल निकलेगा
समेटने को कलेजा बचाकर रखो ।
निपट वैरागी न योगी न भोगी
वास अधर में तुम संतुष्ट मन हो
करूणित क्रंदित आहत भयभीत
हृदय का कैसे संबल हो ?
विछोह में दुनिया छोड़ चले
हर एक बंधन तोड़ चले
प्रेम वियोगी बनने को
जग में क्या फिर होड़ चले ?
अश्क धार आंख समंदर करती है
ये नदी हर छोर खंजर करती है
प्रेम विह्वल हम नहीं जमाना है
ये चाहत रोज तमाशा करती है ।
खुद को खुद में समेट लेना
वियोग नहीं प्रेम दर्शाना है
बंधन मुक्त पिंजर से निकलकर
नभ में रास रसाना है ।
© अंबिकेश कुमार चंचल

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